लक्ष्य
लक्ष्य
रवि को स्वयं की आग में
जल - जल कर ठंडक तलाशते
मैंने देखा है ।
जलधि को अपनी ही गहराई में
डूबते - उतराते तट तलाशते
मैंने देखा है ।
अम्बर को अपने ही विस्तार में
झुल-झुल कर सतह तलाशते
मैंने देखा है ।
भावनाओं के समंदर से उबरते
विचारों के मंथन से निकलते
मैंने जान लिया है -
मानव मात्र निमित्त है ।
स्व की खोज में निहित उसकी चेतना है
दूसरों से अनभिज्ञता उसकी विडंबना है ।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 13-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ
sundar post hae bdhai.
आत्म-चिन्तन की सहज मन
की गहराई तक पहुँचने वाली
अभिव्यति।
धन्यवाद।
आनन्द विश्वास
gahan chinta wishayak kavita.....ati uttam
gahan chintan se otprot shandaar rachna
sundar rachnaa.
सुन्दर....
आप सभी के प्रशंसा भरे शब्दों से नए निर्माण को बल मिलता है । मैं आपकी शुक्रगुज़ार हूँ ।